लोग क्या कहेंगे...... ?
कर्म प्रधान इस संसार में हम लोगों को साधरणतया अच्छे या बुरे कर्म के पैमाने पर आंककर उसके व्यक्तित्व के बारे में कोई धारणा बनाने की कोशिश करते रहे हैं, और यह हमारे समाज में एक आदर्श पैमान माना जाता रहा है। समय के साथ-साथ लोगों के पैमाने भी बदलते हैं।
वर्तमान समय में व्यक्ति की आर्थिक व सामाजिक हैसियत पर अधिक जोर दिया जाने लगा है, चाहे उसके कर्म कैसे भी क्यों न हों ? वक्त के इस बदलाव ने लोगों की सोच को भी पूरी तरह से बदल डाला है। आज यह स्थिति आ गई है कि सच्चा व्यक्ति भी अच्छा कार्य करने से पहले इस संशय में रहता है कि पता नहीं लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे। जबकि ग़लत कर्म करने वाला बेफिक्र रहता है कि दुनिया जाय भाड़ में मुझे जो करना है मैं वही करूंगा। हमारा परिणाम प्रेमी समाज सिर्फ़ यह देखता है कि व्यक्ति अपना मन चाहा लक्ष्य पाने में कितना सफल है। उसने यह सफलता कैसे हासिल की उससे उसे कोई मतलब नहीं होता।
कर्म की जगह जीवन में सफलता को ही सही पैमाना मानना हमारे मौजूदा समाज की सबसे बड़ी कमजोरी है, जो कि एक विकृत समाज का प्रतीक है। समाज की इसी विकृति ने अनेक बुरे रीति-रिवाजों और परंपराओं को जन्म दिया है जिसके भयावह परिणाम आज हम सब लोग भुगतने को मजबूर हैं ?

विवाह.. एक ऐसा जरूरी संस्कार है जो किसी भी सभ्य समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। लेकिन इस आवश्यक कार्य को संपन्न करने के लिए कुछ जरूरी सामाजिक रीति-रिवाजों से गुजरना होता है।
वर्तमान समय में यही रीति-रिवाज अनेक लोगों के लिए बड़ी मुसीबत का सबब बन गए हैं, क्योंकि समाज के चंद समृद्ध लोगों ने अपना रूतबा दिखाने के लिए इसमें ऐसी कुरीतियों और दिखावों का समावेश कर दिया है जिससे चाहे अनचाहे कम आय वाले वर्ग को भी गुजरना पड़ता है। इस वजह से इस वर्ग को अक्सर भयंकर आर्थिक कष्टों व मुसीबतों का सामना करना पड़ता है।
हमारे समाज के कुछ सुलझे हुए लोगों ने इसका तोड़ निकालने की कोशिश की है। इनके प्रयासों से अब हमारे देश में अनेक जगहों पर सार्वजनिक सामूहिक विवाह समारोहों का आयोजन होने लगा है ताकि कम आय वाले वर्ग को आर्थिक मुसीबतों से बचाया जा सके। जरूरतमंद लोग इसका लाभ भी उठाने की कोशिश करते हैं। कुछ लोग समाज सेवा करने वाले इन लोगों को भी शक की नज़र से देखते हैं और सोचते हैं कि इस काम में इसका भी जरूर कोई फायदा होगा।
जबकि ऐसा समाजसेवी व्यक्ति अनेक तरह त्याग करके इन चुनौतीपूर्ण आयोजनों का बीड़ा उठाता है और अपनी निजी ज़िंदगी से तमाम तरह के समझौते करता है ताकि किसी जरूरतमंद का घर बस जाय। लेकिन हमारे समाज के कई रूढ़ीवादी दिखावा पसंद लोगों को यह बदलाव रास नहीं आ रहा। ये लोग ऐसे सार्वजनिक विवाह कार्यक्रमों को हेय दृष्टि से देखते हैं और इसमें शामिल होने वालों को कमतर आंकने की कोशिश करते हैं जिससे प्रोग्रेसिव सोच रखने वाले कुछ लोग भी ऐसे समारोह में अपने लड़के-लड़कियों का विवाह करने के पहले संशय की स्थिति में आ जाते हैं कि…. लोग क्या कहेंगे..?

ऐसे लोगों की परवाह करना कितना सही है ?:
ग़लत काम करके भी अपनी शान दिखाने और सही रास्ते पर चलने से हिचकिचाने वाला समाज कभी भी उन्नती की ओर नहीं बढ़ सकता। आज हमारा समाज दहेज प्रथा के दंश और ख़र्चीली शादियों के दिखावे से बेहद परेशान है। इससे लोग भारी क़र्ज़ के बोझ तले दब रहे हैं, शादी के पश्चात पूरा परिवार अनेक तरह की मुसीबतें झेलता है और लोग एक दूसरे की जान लेने पर भी उतारू हो जाते हैं।
समाज के कुछ प्रबुद्ध लोगों ने समाज को इस मुसीबत से बचाने के लिए सार्वजनिक सामूहिक विवाह आयोजनों का अभियान चलाया हुआ है ताकि लोगों को राहत मिले।… लेकिन हमारे समाज के कई जरूरतमंद लोग इसमें खुले दिल से शामिल होने से सिर्फ़ इसलिए हिचक रहे हैं कि… लोग क्या कहेंगे… क्या ये अपनी औलाद की शादी जैसी जरूरी ज़िम्मेदारी को भी नहीं निभा सकता…? लोग कहेंगे… औलाद तो पैदा कर ली लेकिन शादी के लिए दूसरों का मुंह तक रहा है.. ? शादी कहीं ऐसे भी होती है…? औलाद भले ही कुंवारी बैठी रहे लेकिन हम ऐसी शादी कभी नहीं कर सकते.. वगैराह.. वगैराह … जितने मुंह उतनी बातें।
अगर कोई आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्ति ऐसे समारोह में अपने बच्चे की शादी करता है तो यही लोग कहते हैं… देखो इतना पैसे वाला है लेकिन अपने बच्चे की शादी का ख़र्च बचा लिया.. कंजूस कहीं का..? ये सवालिया निशान हर उस शख़्स पर लगाये जाते हैं जो सामाजिक बदलाव की कोशिश कर रहा है या अपनी मुसीबत को कम करना चाहता है। ऐसे लोग सराहना और प्रोत्साहन के हक़दार हैं आलोचना और तानों के नहीं। इन पर समाज को उन्हें शर्मिंदा करने की जगह गर्व करना चाहिए। समाज के उत्थान में योगदान देने वाले इन प्रगतिशील लोगों को इन दकियानूसी सोच वाले चंद विकृत दिमाग के लोगों की बिलकुल परवाह नहीं करनी चाहिए।

क्या जबाब है इस रूढ़ीवादी सोच का.. ?
अगर आप सच्चाई और अच्छाई की डगर पर आगे बढ़ना चाहते हैं तो इन पुरानी बकवास सोच रखने वालों से निपटना कोई मुश्किल काम नहीं है। ये वही लोग हैं जो मुसीबत के समय आपसे मुंह फेर लेते हैं… जो बुरे समय में आपकी फजीहत होने का इंतजार करते हैं और उसका मज़ा लेते हैं… ये कभी आपके काम में आने वाले लोग नहीं होते। हमें इन रूढ़ीवादी सोच रखने वाले मतलबी लोगों को ज़रा भी भाव नहीं देना चाहिए बल्कि कुछ ग़लत कहने पर उन्हें मुंहतोड़ जवाब देना आपका हक़ बनता है। जब बुरे समय में वो आपकी मदद नहीं कर सकते तो आपके सही राह चलने पर उन्हें कुछ कहने का अधिकार नहीं बनता। समाज की बुराइयों से जकड़े बैठे ऐसे तत्वों को आईना दिखाना बेहद जरूरी हो जाता है वर्ना ये कभी भी आपको चैन से जीने नहीं देंगे।
प्रगतिशील सोच से ही हमारे समाज की उन्नति संभवः
यह सच है कि हमारा देश कई तरह के रीति-रिवाजों और परंपराओं को मानने वाला देश है जिनकी पैठ हमारे समाज में काफी गहरी है। हर सामाजिक परंपरा लोगों की भलाई के लिए ही शुरू की जाती है लेकिन समाज के कुछ लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए धीरे-धीरे उनमें ऐसी अनेक विकृतियां पैदा कर देते हैं जिससे व्यक्ति और समाज दोनों की हानि होने लगती है।
आज कुछ ऐसा ही हमारी पुरातन विवाह परंपरा के साथ हो रहा है। चंद स्वार्थी व लालची किस्म के लोगों ने इस पवित्र बंधन को व्यापार बना दिया है जिसमें देश का आम आदमी बुरी तरह से पिस रहा है। लेकिन हर समस्या का समाधान भी कहीं न कहीं मौजूद होता है। हमारे ही समाज के कुछ प्रगतिशील सोच वाले लोगों द्वारा प्रयास किया जा रहा है कि दहेज और फ़िज़ूल ख़र्ची से परे एक ऐसी विवाह व्यवस्था क़ायम की जाय जिससे कोई भी व्यक्ति कन्यादान जैसे पुनित कार्य को सहज ढंग से संपन्न कर सके। ऐसी प्रगतिशील व्यवस्थाओं को सही ढंग से अपनाने और उसका लाभ लेने के लिए भी लोगों की सोच का प्रगतिशील होना बहुत जरूरी है। हम जब भी लीक से हटकर कुछ नया व अच्छा करने की कोशिश करते हैं तो परंपरागत सोच रखने वालों से टकराव अवश्य होता है, इतिहास इस बात का साक्षी रहा है। लेकिन ऐसी विरोधी विचारधारा वाले लोगों को जब तक क़रारा ज़वाब नहीं मिलेगा वो इस तरह के अच्छे विचारों का हनन करते रहेंगे।
अपना व समाज का भला करने वालों को संकुचित मानसिकता वाले लोगों से ज़रा भी डरना नहीं चाहिए। डरें तो वो लोग जो समाज में भ्रम फैलाकर अच्छे मक़सद से काम करने वालों के लिए बाधाएं उत्पन्न करते हैं आप कुछ भी करने जायें तो लोग तो कुछ कहेंगे क्योंकि लोगों का काम है कहना क्यों हम छोड़ें ये बेकार की बातें और अपने सत्प्रयास में जुट जायें।