विवाह प्यार का एक पवित्र रिश्ता
ऐसा माना जाता है कि इस ब्रह्मांड में हर चीज एक दूसरे से जुड़ी हुई है, चाहे वह कितनी भी दूर क्यों न हो पृथ्वी इस ब्रह्मांड का एक छोटा सा बिंदु है लेकिन आज इस पर असंख्य प्राणी रहते हैं. जो कि न सिर्फ एक-दूसरे से जुड़े हुए है बल्कि एक दूसरे पर निर्भर भी है। वर्तमान समय में इस धरती पर मनुष्य का आधिपत्य है। यह माना जाता है कि मानव की संवेदना वहां के बाकी प्राणियों से अलग है, वह सभी प्राणियों के मर्म को बेहतर तरीके से समझता और उन्हीं के अनुसार वह सबसे व्यवहारिक आदान प्रदान करता है। इंसान के आपसी रिश्ते चाहे अनचाहे इस कदर अविश्वसनीय तरीके से आपस में जुड़े हुए हैं जो उसे अन्य जीवों से अलग करते हैं। मनुष्य में ‘प्यार’ का तत्व ऐसा अनोखा होता है जो किसी भी जीव को अपना बनाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
मानव समाज ने जब नर-नारी के आपसी रिश्ते को ‘विवाह’ का रूप दिया गया तो वह ‘प्यार’ ही था जिसने दो जिस्मों को हमेशा के लिए एक करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। यह प्यार की ताकत है कि दो अनजान लोग (स्त्री-पुरुष) विवाह के पश्चात इतने लम्बे समय तक एक साथ रह पा हैं। हम अगर इस रिश्ते में से प्यार का तत्व निकाल दे तो यह रिश्ता निरर्थक हो जाएगा।

'विवाह' प्यार के इस रिश्ते को पवित्र बनाता हैं।
सभ्य समाज में विवाह पति-पत्नी के प्यार को एक गरिमामयी पवित्रता प्रदान करता है और समाज में उसे एक अलग ही प्रतिष्ठा दिलाता है, जो उनके बीच के संबंधों को किसी और तरीके से प्राप्त नहीं हो सकती। विवाह संस्कार को अपनाने के पहले भी समाज में नर-नारी आपसी अंतरंग रिश्तों में रहते थे और वे बच्चे पैदा करते थे, कुछ लोग अभी भी ऐसा करते हैं। लेकिन नर-नारी के ऐसे रिश्तों में हमेशा अविश्वसनीयता व असुरक्षा की भावना रहती है और एक दूसरे के छले जाने का भय हमेशा व्याप्त रहता है। ऐसे रिश्तों में खासकर नारी जाति के आत्मसम्मान को गहरी ठेस पहुंचती है और इस प्रक्रिया में जिनकी सबसे ज्यादा दुर्दशा की संभावना रहती है वह हैं उनके बच्चे, जिन्हें बिना किसी अपराध के ऐसी सजा भोगनी पड़ सकती है जिसकी कल्पना करना भी कष्टदायक होता है। यही कारण है। कि दुनियाभर में सुखी व सम्मानीय घर परिवार बसाने का तरीका विवाह ही माना जाता है।
'लिव इन रिलेशनशिप' सामाजिक पतन का संकेतः
हमारे समाज का परिदृष्य बड़ी तेजी से बदल रहा है। इस बदलते वक्त ने स्त्री-पुरूष के आपसी अंतरंग रिश्ते बनाने के तरीकों को भी बदल दिया है। पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश में ‘लिव इन रिलेशनशिप’ रखने का चलन तेजी से बढ़ा है जिसमें स्त्री- -पुरुष बिना शादी के एक साथ पति-पत्नी की तरह रहते हैं और कई मामलों में वे बच्चे पैदा करके अपना परिवार भी बढ़ाते देखे गए हैं। ऐसे मामले पहले संपन्न परिवारों में अधिक देखे जाते थे लेकिन की यह रोग अब कई मध्यम वर्ग के लोगों में भी फैलन के जा रहा है।
हालांकि ऐसे रिश्तों के कायम रहने की समयावधी अल्प होती है, फिर भी कुछ लोग ऐसे रिश्तों में विश्वास रखने लगे हैं। यह सिर्फ पश्चिमी देशों का अंधानुकरण करने का नतीजा है, यह कहीं से भी भारत की हजारों वर्ष पुरानी समृद्ध संस्कृति से मेल नहीं खाता जिसमें इंसान के लिए विवाह को एक अनिवार्य संस्कार माना गया है। अवैध रिश्तों का यह चलन एक चलताऊ फैशन की तरह है जो हमारे देश में ज्यादा दिन तक टिकने वाला नहीं है, इसके दुष्परिणाम इसे स्वतः ही हमारे समाज से बाहर कर देंगे।
विवाह तीन संस्कृत शब्दों से बना है:
वि का मतलब है हम, वा का मतलब योग्य पात्र और ह का मतलब है जुड़ना । संस्कृत के इन तीन शब्दों से मिलकर वि+वा+ह=विवाह का निर्माण हुआ है। विवाह में दो इंसानों (स्त्री व पुरूष) की जरूरत पड़ती है। इनके बीच का बंधन एक ऐसा मजबूत रिश्ता बन जाता है जो खून के रिश्तों से भी कई बार ताक़तवर हो जाता है। इसे आसानी से कोई डिगा नहीं सकता और यह जीवन की हर मुश्किल
को परास्त कर सकता है। वैवाहिक रिश्ते में प्रेम यानि प्यार ठीक वही मायने रखता है जो किसी शरीर के लिए आत्मा का मायना होता है। शरीर से आत्मा निकल जाने से जिस तरह वह बेजान या मृत हो जाता है, उसी तरह विवाह के रिश्ते से हम प्यार को अलग कर दें तो यह रिश्ता भी बेजान हो जायेगा। विवाह के रिश्ते की बुनियाद प्यार ही है और इसका अस्तित्व भी प्यार पर टिका रहता है इसलिए हर पति-पत्नी को प्यार की अहमियत अच्छी तरह से पता होनी चाहिए।

दो आत्माओं का एकाकार होना ही 'विवाह' है
ऐसा माना जाता है कि पति-पत्नी का रिश्ता ईश्वर रचित होता है। विवाह में दो विपरीत एनर्जी आपस में मिलती हैं, यह दो आत्माओं का पवित्र मिलन है। इसमें दो शक्तियों और दो विचारों का मिलन होता है जो एक महाशक्ति बनकर हर मुश्किल के सामने डटा रह सकता है। मानव जीवन अनेक तकलीफों और मुश्किलों से घिरा रहता है। पति-पत्नी मुश्किल समय में एक और एक दो नहीं बल्कि एक और एक ग्यारह वाली शक्ति हासिल कर हर मुसीबत को झेलने का माद्दा रखते हैं। यही इस रिश्ते की ताकत है और इसकी सार्थकता भी।

पति-पत्नी एक दूसरे के पूरक हैं प्रतिद्वंदी नहीं
दो इंसानों का मिलन हमेशा दो विचारों का मिलन ही होता है। भिन्न विचार जब एकीकृत होने की कोशिश करते हैं तो कभी-कभी या अकसर उनमें मतभेद हो जाना भी स्वभाविक है, लेकिन समझदारी इसी में है कि मतभेद मनभेद में न बदलें वर्ना इस रिश्ते के अलगाव की पटरी पर बढ़ते देर नहीं लगती। बहुत संवेदनशील होता है यह रिश्ता इसलिए आपसी समझबूझ और विश्वास के द्वारा इसे सदा चलायमान रखना चाहिए। आपसी सामंजस्य का होना रिश्ते को हमेशा लचीला बनाए रखता है, जो मुश्किल वक्त में इसे आसानी से टूटने नहीं देता और आपसी संबंधों की मधुरता बरकरार रखता है। यही इस अद्वितीय रिश्ते की खूबसूरती है जो हममें अभूतपूर्व धैर्य पैदा करना सिखाती है, जीवन के सही मायने बताती है और जिंदगी को प्यार से लबरेज़ कर देती है।