क्या दान भगवान के पास जाता है...?
ऐसा माना जाता है कि हमारा यह संसार पुण्य और पाप कर्म के निष्कर्ष पर आधारित होकर चलता है। गीता में भी मनुष्य के कर्म को प्रधान माना गया है यानि वह जैसा कर्म करेगा उसे वैसा ही फल भोगना होगा।
जब हम इस दुनिया में दीन-दुखियों को देखते हैं तो मन में उठे दर्द से ‘आह’ निकलती है कि ईश्वर ने इसे इतना दुखः क्यों दिया है ?.. फिर शायद हम यह सोचकर स्वयं को समझाने की कोशिश करते हैं कि शायद यह उसके पूर्व जन्म के कोई पाप होंगे। कुछ दयावान लोग ऐसे व्यक्ति की सहायता करने की कोशिश करते है और कई लोग उसे सिर्फ़ देखकर वहां से गुज़र जाते हैं।

हमारे समाज में चंद लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने मुहिम चलाई हुई होती है ऐसे जरूरतमंद दुखी लोगों की मदद करने के लिए। पहली और तीसरी श्रेणी के लोगों की भावना और कार्य को हम दान या पुण्य की दृष्टि से देखते हैं। लेकिन दूसरी श्रेणी के सभी लोग भी गलत सोच वाले नहीं होते, क्योंकि इसके पीछे उसकी अपनी कोई मजबूरी भी हो सकती है, जैसे- हो सकता है उसे कहीं बेहद ज़रूरी काम से जाना हो या उसके पास सहायता करने के ज़रूरी साधन व पैसा न हो वगैराह ।
अगर इनमें से कोई बात न हो और उसने सक्षम होने के बावजूद उसकी सहायता न की हो तो भी ज़रूरी नहीं कि वो पाप का भागी कहलायेगा ? यह बात आपको बहुत अजीब लग सकती है लेकिन सत्य है । इस दुनिया में बहुत बड़ी तादाद में लोग बहुत दुखी व परेशान हैं, क्या एक व्यक्ति हर किसी की मदद करने में सक्षम है.. तो जवाब नहीं में होगा। हो सकता है उस मदद न करने वाले व्यक्ति ने शायद हाल फिलहाल में किसी दूसरे जरूरतमंद व्यक्ति की मदद की हो और आज वो इसे इसलिए नज़र अंदाज करके चला गया कि, वह हर किसी की हर वक्त मदद कैसे कर सकता है ? हां, अगर वह किसी व्यक्ति को जानबूझकर दुखी करने की वजह रहा हो तो ज़रूर वो पाप का भागी होगा।
कहने का तात्पर्य यह है कि दान..पुण्य के प्रति हमारा आमतौर पर जो नज़रिया होता है, ज़रूरी नहीं कि वह हमेशा सही हो इसलिए किसी व्यक्ति के बारे में कोई निश्चित धारणा बनाने के पहले हमें कई बार सोचना चाहिए।.. फिर भी हम होते कौन हैं किसी के बारे में धारणा बनाने वाले? क्या दान है या क्या पुण्य इसका निर्णय करने का अधिकार सिर्फ़ ईश्वर के पास है और वही इसे निर्धारित करता है, तो अब यह प्रश्न उठता है कि क्या हमारे द्वारा दिया गया दान या पुण्य कर्म भगवान के पास जाता है ?
दान क्यों कहलाता कहलाता है सबसे बड़ा पुण्य कर्म ?
दान कहां जाता है इस प्रश्न को हल करने के पहले हमें दान की महत्ता को जानना आवश्यक है। इस संसार में लोग अनेक तरह की पीड़ाओं से ग्रस्त हैं और भयंकर कष्ट से ग्रस्त लोगों की संख्या भी इतनी अधिक है कि उन्हें दूर करना हर किसी व्यक्ति या संस्था के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। इसी वजह से कुछ लोग पृथ्वी को पाप ग्रह भी कहते है, जहां हर जीव अपने पापों का भुगतान करने के लिए आता है।.. बावजूद इसके इस दुनिया में आशावादी लोगों की भी कमी नहीं है और वे दुखियों के प्रति सार्थक दृष्टिकोण रखते हुए अपने सुख-दुख छोड़कर परायों की पीड़ा कम करने की कोशिश में जुटे रहते हैं। हमारे द्वारा दिया गया दान भी ऐसे ही पीड़ितों के काम आता है। अगर हम अपने धन या साधनों से किसी जाने अनजाने व्यक्ति की दुख तकलीफें कम करने में मददगार बनते हैं तो इससे बड़ा पुण्य कार्य और क्या हो सकता है? यही कारण है कि जिन्हें समय रहते इस शाश्वत सच का ज्ञान हो जाता है वो अपना सर्वस्व इन दीन-दुखियों पर न्योछावर करके अपना जीवन लोगों के कष्ट मिटाने में लगा देते हैं। आज पूरी दुनिया में असंख्य लोगों ने जरूरतमंद परेशान व्यक्तियों के लिए दान के भंडार खोले हुए हैं और वे ऐसा करके स्वयं को सबसे अधिक सौभाग्यशाली मानते हैं एवं मन में बेपनाह सुकून महसूस करते हैं, यही दान की शक्ति है।

सब कर्मों पर भारी है दान
सनातन धर्म में ऐसा माना जाता है कि किसी जीवात्मा को मनुष्य योनि इसलिए मिलती कि वह सतकर्मों के द्वारा जन्म-जन्मांतरों के पाप से मुक्त हो सके। मनुष्य में ही वह बुद्धि होती है कि वह अच्छाई और बुराई में फ़र्क कर सही मार्ग को चुन सके। ईश्वर के द्वारा दिये गए इस सुअवसर का हम कैसे उपयोग करते हैं यह हमारे ऊपर छोड़ दिया गया है। अपना जीवन जीने के बाद जब हमारी जीव आत्मा ईश्वर की शरण में पहुंचती है तो हमारे कर्मों को अच्छाई और बुराई की तराजू में तोला जाता है। जब इसका हिसाब हो रहा होता है तो ज्यादातर मनुष्यों के दुष्कर्म उनके सत्कर्मों पर भारी पड़ने लगते हैं। तब हमसे पूछा जाता है कि मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणी के रूप में जन्म लेकर तुमने दूसरे मनुष्यों व अन्य जीवों की क्या मदद की, क्योंकि पृथ्वी लोक पर तो हर प्राणी किसी न किसी समस्या से ग्रस्त होता है। एक मानव होने के नाते तुमने मानवता भरे कौन-कौन से कारनामे किए ?.. और इंसाफ की उस डगर पर मानवीय दान सब कर्मों पर इसलिए भारी पड़ता है क्योंकि इस संसार में हर मनुष्य की अपनी अनंत आवश्यकताएं हैं और अपना धन तो हमेशा स्वयं के लिए ही कम नज़र आता है। ऐसी स्थिति में कोई इंसान दूसरे का दुख-दर्द महसूस करके उसे अपने धन या साधन को दान करता है तो उसका सबसे बड़ा पुण्य मिलता तो अवश्यमभावी है। दान के उस महा पुण्य से हमारे बड़े से बड़े पाप धुल सकते हैं और हमारा मुक्ति मार्ग खुल सकता है।..शायद इसलिए कहते हैं कि दान कर्म सब कर्मों पर भारी है।
आज दानवीरों के कारण हम बड़ी से बड़ी समस्याओं का कर सकते हैं निदान
बूंद-बूंद से सागर बनता है, ठीक उसी तरह दान के एक-एक पैसे को जोड़कर लोगों ने जनता की भलाई के लिए ऐसे-ऐसे मुश्किल कामों को संभव कर दिखाया है जो कि पहले नाममुकिन समझे जाते थे। दान एक पैसे का हो या एक अरब का सब जरूरतमंद लोगों के काम आता है, जो इस दुनिया की मुश्किलों को कम करता है। यही कारण है कि आज दुनियाभर में दान के पैसों से हर देश में कठिन समस्याओं से निपटने के लिए बड़े-बड़े अभियान चल रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थय, असहाय लोगों की मदद, भूख व गरीबी जैसी बड़ी समस्याओं का निदान आज हर देश दान के दम पर ही करना चाह रहा है। विश्व के अतिधनाड्य व्यक्तियों ने अपनी कमाई की मोटी राशि दान देकर कई जनसेवी संस्थाओं का निर्माण कर जरूरतमंद लोगों की मदद की है। सदियों से यह सिलसिला इसी तरह से जारी है और भविष्य में भी चलता रहेगा। क्योंकि आज अधिकांश लोग यह जान चुके हैं कि एक इंसान होने के नाते अपने धन या साधनों से दूसरों की मदद करने से अच्छा कोई काम नहीं और यही हमें परमात्मा की राह पर आगे बढ़ाता है।
सबसे बड़ा दान है कन्यादान

किसी भी भलाई के कार्य के लिए दान देना पुनित कर्म कहलाता है लेकिन हर दान का अपना अलग महत्व है। यह इस बात पर निर्भर है कि आप किसी व्यक्ति को कितने मुश्किल हालात से उसे निकलने में उसकी सहायता कर रहे हैं। साधारणतया एक भूखे को भोजन देना बहुत बड़ा दान माना जाता है। लेकिन इस दुनिया में भूखा तो भीख मांगकर भी पेट भर सकता है लेकिन भारत जैसे देश में जहां अधिकतर लोगों की आमदनी इतनी कम है और उस स्थिति में सीमित आय वाले व्यक्ति को आडंबर और दिखावे से भरे हमारे समाज में अपनी कन्या का विवाह करने का दबाव हो तो वो व्यक्ति चाहकर भी किसी से भीख नहीं मांग सकता ? उसे हर हाल में अपनी बेटी का कन्यादान करना ही होगा। ऐसी परिस्थिति में कोई व्यक्ति या संस्था कन्यादान में उसकी मदद करे तो एक कन्या का घर बसा जाता है और उसके घरवालों की इतनी बड़ी परेशानी दूर हो जाती है। ऐसी स्थिति में दिया हुआ दान कितना महत्वपूर्ण होगा यह हम समझ सकते हैं। इसी वजह से कन्यादान को महादान माना गया है।
न करें ऐसे लोगों को नज़रअंदाज
हर इंसान के लिए समय बहुत क़ीमती है, अगर कुछ लोग दूसरों की सहायता के लिए अपना क़ीमती वक्त निकालकर सेवा करते हैं तो हर व्यक्ति का यह फ़र्ज बनता है कि वो उन्हें प्रोत्साहन दे। समाज सेवा में लगे लोग अपना सुख-चैन, घर-परिवार, धन-साधन इत्यादी का त्याग कर ज़रूरतमंदों की सेवा कर रहे हैं, उन्हें हमें कभी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए बल्कि ऐसे मददगारों की हर तरह से मदद करना हम सभी का फ़र्ज बनता है। हमारे समाज के सक्षम वर्ग में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो समाज की सेवा में लगे इन जुनूनी लोगों की सहायता करने के बड़े-बड़े आश्वासन तो देते हैं लेकिन ज़रूरत के समय पर पीछे हट जाते हैं, ऐसे बेभरोसे के ढोंगी लोग समाज के लिए ज्यादा ख़तरनाक हैं बनिस्पत उन लोगों के जो कि आपके मुंह पर ही सहायता के लिए इंकार कर देते हैं। ऐसे लोग शायद यह नहीं जानते कि आपके हर कर्म पर ईश्वर की नज़र है, कम से कम उसे तो धोखा देने की कोशिश न करें ?.. तो कुल मिलाकर बात वहीं आकर रूक जाती है कि क्या सचमुच ईश्वर की नज़र हम पर होती है?.. क्या हमारे द्वारा दिया गया दान भगवान (ईश्वर) के पास जाता है ? हम अब बड़े गर्व के साथ कह सकते हैं ‘जी हां यह सत्य है’.. ।